भावार्थ (Substance) kise kahte hai

622

भावार्थ (Substance)

वक्ता या लेखकका मनशाय, मनोभाव, मनोवृत्ति क्रियाका रुप भाव या अर्थ है। वाक्य मे क्रिया वक्ता के निश्चय, अनिश्चय, प्रथना, इच्छा, आज्ञा आदि अर्थ या भाव प्रकट करता है। इस प्रकार से क्रिया निश्चय, अनिश्चय, सम्भावना, प्रथना, इच्छा, आज्ञा आदि व्यक्त करना ही क्रियाका भाव है।

भाव तीन प्रकार के होते है : सामान्यार्थ विध्यर्थ और अनिश्चर्थ।

सामान्यर्थ : –

सामान्य भाव या निश्चय सम्झने वाले क्रियाके रुपको सामान्यर्थक कहते है। सामान्यर्थक किसी कार्य, घटना या स्थिति के बारे मे होना या नहोना बातता है। इसका अभिव्यक्ति करण, अकरण, प्रश्नसूचक तथा सभी काल और पक्षमे होता है।

जैसे :
भाइ विद्यालय गया।

काले बजार नही गया।

हम व्याकरण पढते है।

वो लोग गीत गा रहे थे ।

सुरेश गीत गा रहा था ।

विध्यर्थ : –

वक्ताका इच्छा, आज्ञा, विन्ती, अनुमति आदि अर्थका अवधारणा प्रकट किया गया क्रिया विध्यर्थ है। ये दो प्रकार का होता है।
आज्ञार्थ और इच्छार्थ।

आज्ञार्थ :

आज्ञा, आदेश, हुकुम इस तरह के काम करने वाले क्रिया को आज्ञार्थक क्रिया कहते है।
इसमे आदेश देने वाला कर्ता और काम करने वाला कर्ता अलग – अलग होते है।
आदेश देने वाला कर्ता दृश्य या अदृश्य हो सकता है। आज्ञार्थ क्रियापद द्वितीय पुरुष और दोनो वचन मे होता है। इसमे काल का भेद नही होता है।

आज्ञार्थक क्रियाका रुप इस प्रकार से संचलित होता है।

धातु + Φ , ई, अ, ओ, आ + इये आदि प्रत्यय है।

Φ = ( शून्य प्रत्यय ) ये अनादर, एकवचन मे आता है ।

जैसे : तू पढ।

ई = अनादर, एकवचन मे लगता है।

जैसे : उसको पकड़ो ।

अ, ओ = मध्यम आदर, दो वचनमे लगता है।

जैसे : तुम पढो।

तुम कालेज जाओ।

आ, ये = उच्च आदर, दो वचन मे लगता है।

जैसे : आप बाजार जाइये।

आप खाना खा लिजीये ।

आज्ञार्थक ‘ सचेतता ! आच्छे से लिखो। ‘ राम ‘ !
आज कालेज मत जाना। ‘ इस तरह के वाक्य भी आते है , लेकिन इस वाक्यमे सर्वनाम द्वितीय पुरुष ‘ तुम ‘ विलुप्त हुवा होता है। तसर्थ ये वाक्य ‘ सचेतता! (तुम) आच्छे से लिखो।’ और आज
कालेज मत जाना ।’ धातु + ना से आज्ञार्थक बनाना सकर्मक क्रिया होते हुए कर्ता मे ने लग सकता है।

जैसे : तुमने किताब पढा।

तुमने खाना खाया।

इच्छार्थ :

इच्छा, अनुमति, आशीष, श्राप, प्रथना, बिन्ती जैसे भावको सम्झने वाले क्रियाको इच्छार्थक कहते है। इच्छार्थक तीनों पुरुष और दोनो वचन मे होते है। इसमे काल से सम्बन्धित भेद नही होता।

इच्छार्थक क्रियाका रुप इस प्रकार संरचित होते है :

धातु + ऊँ, ऐँ, है, गे, आ,उन, नि+इए

ऊँ = प्रथम पुरुष, एकवचन मे लागता है।
जैसे : मै घर जाऊँ ।

ऐँ = प्रथम पुरुष, बहुवचन मे लगता है।
जैसे : हम लोग चिठी लिखेँ।

है = द्वितीय पुरुष, एकवचन,अनादरमे लगता है।
जैसे : तू भाग्यमानी है ।

गे = द्वितीय पुरुष, मध्यम आदर, दोनो वचन मे लगता है।
जैसे : तुम विद्वान् बनोगे।

आ = तृतीय पुरुष, एकवचन, अनादर मे लगता है।
जैसे : उसने नाटक देखा ।

उन = तृतीय पुरुष, दोनो वचन, मध्यम आदरमे लगते है।
जैसे : उन लोग ने नाटक दिखाया।

ना + जीए = द्वितीय पुरुष/तृतीय पुरुष, दोनो वचन,उच्च आदरमे लगता है।
जैसे : आप लोग सुनलिजीए ।

इच्छार्थक क्रियापद प्रयोग करने से सकर्मक क्रिया होने से कर्ता मे ‘ने’ लग सकता है।
जैसे : पशुपतिनाथने आर्शीवाद दिया।

इन उदाहरणों मे तीन बातें स्पष्ट हैं।
जैसे-

भावार्थ संक्षिप्त होना चाहिए।
भावार्थ व्याख्या के रुप नहीं होना चाहिए।
भावार्थ में अन्वयार्थ भी नहीं होना चाहिए।

भावार्थ की प्राथमिक विशेषता उसकी संक्षिप्तता है। हम थोड़े में सब कुछ कह जायें – यही इसकी पहेली शर्त है। फिर ‘भावार्थ’ संक्षेपण (precis) से बिलकुल भित्र है।

यहा पर उदाहरण दिया जा रहा है –

मूर्ति तैयार हुई। मूर्तिकार उसे बाजार ले गया। पर दुर्भाग्य! वह न बिकी। अब कौन मुँह लेकर घर लौट। आखिर घर तो उसे लौटना ही था। उसे देखते ही उसका बच्चा ‘बताशा – बताशा’ चिल्लाता हुआ दौडा़ और उसके आगे हाथ फैला दिया।

मूर्तिकार के मुख से कोई शब्द न निकला। वह बच्चे को अपने गोद से चिपकाकर रोने लगा। वह सोचने लगा-जिसने धनवानों को बनाया, जिसने प्रकृति पर अधिकार दिया, जिसने जमिन का बंटवारा किया, क्या उसकी बुद्धि इतनी छोटी हो गयी की कुछ लोग फुलों की सेज पर आराम से सोयें और कुछ लोग पसीने के रुप में दिन – रात खून बहाने पर भी मुठ्ठीभर चने तक भी न पायें!

भावार्थ –

आज पूँजीवाद का भयानक रुप देखने को मिलता है। कुछ लोग बिना हाथ – पैर डुलाये मालपुवा चाभते हैं और सुखका जीवन बिताते है
और कुछ लोग मेहनत करके भी भरपेट अन्न नही पाते। आज दौलत के बाजार में कलाकार को कोई नहीं पुछता। कलाकार भूखा मरता है और अपने बच्चे को बताशा भी खरीदकर नहीं दे सकता।

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here