जीवन परिचय

Surdas ka jevan parichay hindi me: asani se yad kren

सूरदास हिन्दी साहित्याकाश के सूर्य हैं। मध्यकालीन वैष्णव भक्त कवियों में सूरदास का स्थान शीर्ष पर है। जयदेव, चण्डीदास, विद्यापति और नामदेव की सरस वाग्धारा के रुप में भक्ति – श्रृंगार की जो मंदाकिनी विशिष्ट सीमा – कूलों में प्रवाहित होती चली आ रही थी, उसे सूरदास ने जनभाषा के व्यापक धरातल पर अवतरित करके संगीत और माधुर्य से मण्डित किया।

कवि सूर का जन्म संवत् 1540 में आगरा के समीपवर्ती ग्राम रुनकता में हुआ था। महाप्रभु बल्लभाचार्य जी ने इन्हें दीक्षा प्रदान की थी और गोवर्धन स्थित श्रीनाथ जी के मंदिर में आपको कीर्तन करने के लिए नियुक्त कर दिया था। बाद में वल्लभाचार्य जी के पुत्र विट्ठलनाथ जी ने ‘अष्टछाप’ की स्थापना की, जिसमें सूर को स्थापित किया गया। सूर के अंधत्व को लेकर विवाद है। उन्होंने अपनी रचनाओं में श्रीकृष्ण की लीलाओं का जो सूक्ष्म प्रत्यंकन किया है और रुप – रंग की जो परिकल्पनाएँ की है, उसके आधार पर उनका जन्मांध होना असंभव – सा प्रतीत होता है। सूरदासजी की मृत्यु मथुरा के निकट पारसोली नामक ग्राम में संवत् 1620 में हुई थी।

सूर द्वारा रचित ग्रन्थों के नाम इस प्रकार हैं – ‘सूर – सागर’, ‘सूर – सारावली’, और ‘साहित्यलहरी’।
सूरसागर में श्रीमदभागवत् के द्वादश स्कंध के आधार पर श्रीकृष्ण की मधुर लीलाओं को गेय पदों में प्रस्तुत किया गया है। भक्ति को भव्य एवं उदात्त रुप में चित्रित करते समय श्रृंगार और माधुर्य की सर्वभौम सत्ता के जैसा जयघोष सूर ने अपने सूरसागर में किया है वैसा उनसे पूर्व किसी लोकभाषा में नहीं हुआ था। सूरसागर का सर्वाधिक मर्मस्पर्शी और वाग्वैदग्ध्यपूर्ण अंश भ्रमरगीत है, जिसमें गोपिकाओं की वचन- वक्रता अत्यन्त मनोहारिणी है।

सूरदास मूलतः भक्त कवि हैं और इनकी भक्ति सखा भाव की है। श्रीकृष्ण के प्रति उनके भक्त ह्रदय के नाना उदगार उनके काव्य में व्यक्त हुए हैं। उन्होंने अपने आराध्य की समस्त बाल-लीलाओं और प्रेम-क्रीडा़ओ का बहुत ही तन्मयता से चित्रण किया है।

सूर का वात्सल्य वर्णन सूर ने किया अद्वितीयता है। कृष्ण के बाल-रुप और उनकी बालसुलभ क्रीडा़ओं का जैसा वर्णन सूर ने किया है, वैसा सम्पूर्ण विश्व-साहित्य में अन्यत्र दुर्लभ है। वात्सल्य-वर्णन में सूर की समता कोई अन्य कवि नहीं कर सका है। कृष्ण का घुटनों चलना, माखन-चोरी में पकड़े जाने पर बहाना करना, खेलते समय खिसिया जाना आदि विविध बाल-क्रीडा़ओं का मनोहारी वर्णन हमें सूरसागर में प्राप्त होता है।

सूर ने श्रृंगार के संयोग और वियोग दोनों ही रुपों का व्यापक चित्रण अपने काव्य में किया है। कृष्ण और राधा के प्रथम मिलन का दृश्य देखिए –

“खेलन हरि निकले ब्रज खोरी।
औचक सी देखी तँह राधा,नैन विशाल भाल
दिये रोरी।”

सूर का विरह-वर्णन भी हिन्दी-साहित्य में अनुपमेय है। संयोग के दिनों में जिन प्राकृतिक उपादनों से आनंद की तरंगें उठा करती थीं, उन्हीं से वियोग के दिनों में गोपिकाओं के ह्रदय में वेदना उत्पन्न होती है-

“बिनु गोपाल बैरिन भई कुंजैं।
तब ये लता लगति अति सीतल, अब भई
विषम ज्याल की पुंजैं।। “

सूर की भाषा ललित और कोमलकान्त पदावली से युक्त ब्रजभाषा है, जिसमें सरलता के साथ प्रभावोत्पादकता भी विद्यमान है। उसमें संस्कृत के तत्सम और अरबी-फारसी के तत्त्वों के अनुरूप भावुकता एवं सांगीतिकता भी। उनके पदों में अलंकारों का बहुत सहज एंव सुन्दर चित्रण हुआ है। अलंकारों के प्रयोग के संबंध में डा़ॅ हजारीप्रसाद द्विवेदी का यह कथन उल्लेखनीय है – “सूरदास जब अपने प्रिय विषय का वर्णन शुरु करते हैं, तो मानो अलंकारशास्त्र हाथ जोड़कर उनके पीछे-पीछे दौडा़ करता है। उपमानों की बाढ़ आ जाती है, रुपकों की बाढ़ आ जाती है, रुपकों की वर्षा होने लगती हैं। “

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